
वैश्विक ऊर्जा बाजार में इन दिनों तनाव वैसे ही है जैसे गर्मी में ट्रांसफॉर्मर कभी भी फुंक सकता है। ऐसे में International Energy Agency यानी IEA ने एक बड़ा फैसला लिया है।
एजेंसी ने अपने आपातकालीन तेल भंडार का दरवाजा खोलने का ऐलान कर दिया है। सरल भाषा में समझें तो दुनिया के कई देशों ने तय किया है कि वे अपने रिजर्व स्टॉक से बड़ी मात्रा में तेल बाजार में छोड़ेंगे ताकि कीमतों की आग थोड़ी ठंडी हो सके।
388 मिलियन बैरल का ‘ऑपरेशन राहत’- कितना तेल बाजार में आएगा
योजना के अनुसार कुल मिलाकर लगभग 388 मिलियन बैरल तेल बाजार में उतारा जाएगा। इसमें करीब 72 प्रतिशत कच्चा तेल होगा जबकि 28 प्रतिशत रिफाइंड तेल उत्पाद होंगे।
सरकारों ने उद्योगों के अनिवार्य भंडार से 116.6 मिलियन बैरल और अपने निजी भंडार से लगभग 271.7 मिलियन बैरल उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता जताई है। ऊर्जा बाजार में यह कदम किसी फायर ब्रिगेड की तरह माना जा रहा है जहां आग बढ़ती है, वहीं से पानी छोड़ा जाता है।
किस क्षेत्र से कितना तेल आएगा- सप्लाई का वैश्विक नक्शा
IEA की योजना के अनुसार अलग-अलग क्षेत्रों से तेल की आपूर्ति चरणबद्ध तरीके से की जाएगी। अमेरिका महाद्वीप के सदस्य देश अकेले लगभग 172.2 मिलियन बैरल तेल बाजार में उतारेंगे। एशिया-ओशिनिया क्षेत्र के देशों ने तुरंत आपूर्ति शुरू करने का भरोसा दिया है।
जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका से अतिरिक्त आपूर्ति मार्च के अंत तक शुरू होने की संभावना है।
कीमतों पर क्या असर पड़ेगा- बाजार को स्थिर करने की कोशिश
ऊर्जा बाजार का गणित बड़ा दिलचस्प है। अगर सप्लाई कम हो जाए तो कीमतें ऐसे भागती हैं जैसे चुनाव में टिकट मिलने के बाद नेता। और अगर सप्लाई बढ़ जाए तो बाजार थोड़ी देर के लिए शांत हो जाता है।

IEA का मानना है कि इस कदम से वैश्विक बाजार में कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिलेगी और युद्ध से पैदा हुई अनिश्चितता कम होगी।
आयात पर निर्भर देशों को राहत- भारत जैसे देशों के लिए क्या मतलब
दुनिया के कई देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर हैं। ऐसे देशों के लिए वैश्विक सप्लाई में थोड़ी भी राहत बड़ा फर्क डालती है। क्योंकि तेल की कीमतें सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहतीं वे महंगाई, परिवहन और उद्योग तक असर डालती हैं।
विशेषज्ञ की नजर
ऊर्जा विश्लेषक Amit Mittal कहते हैं, “जब भी वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ती है, IEA का रिजर्व एक तरह का सुरक्षा वाल्व बन जाता है।”
वे हल्के तंज में जोड़ते हैं, “तेल की दुनिया बड़ी दिलचस्प है—यहां राजनीति, युद्ध और अर्थव्यवस्था सब एक ही पाइपलाइन से गुजरते हैं।”
असली सवाल अभी बाकी
हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि रिजर्व रिलीज से बाजार को अस्थायी राहत मिल सकती है। लेकिन अगर भू-राजनीतिक तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो यह राहत ज्यादा दिन नहीं टिकेगी। ऊर्जा बाजार की सच्चाई यही है तेल सिर्फ ईंधन नहीं, वैश्विक राजनीति का सबसे महंगा हथियार भी है।
